होली के बहाने भी होता है महिलाओं का यौन शोषण

होली के बहाने भी होता है महिलाओं का यौन शोषण
March 21 12:58 2019 Print This Article

Holi – हरीश बाबू

होली का त्यौहार दिलों में एक अलग सा उमंग लेकर आता है। होली का नाम सुनते ही मस्तीभरा माहौल का नजारा आँखों के सामने छा जाता है। होली का अपना अलग ही महत्व है। होली में क्या दोस्त और क्या दुश्मन सभी अपने गिले-शिकवे दूर करते हैं। होली का त्यौहार लोगों को आपस में जोड़ता है। होली में सभी रिश्ते-नाते बड़ी सहजता के साथ होली लुत्फ़ उठाते हैं, लेकिन कुछ समय से होली में अपनी विकृत मानसिकता लिए पुरुष होली जैसे पर्व को बदनाम करने में लगा हुआ है। आज के आधुनिक युग में जहां मनुष्य चाँद पर पहुंच गया है, लेकिन मानसिकता वहीं जमीन पर छोड़ आया है।

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होली के बहाने अपनी ओछी हरकतें उजागर करना पुरुष के लिए आम बात हो गई है। नये-पुराने कवि और गीतकार होली के काव्य में महिलाओं के दो विशेष अंगों गाल और सीने को लक्ष्य करते हैं। व्यव्हार में भी देखा जाए तो होली पर पुरुष नारी के इन्हीं दो अंगों पर विशेष जोर देता है। यह पुरुष की उसी भोगवादी मानसिकता का घोतक है जिसमें पुरुष प्राय: नारी के इन्हीं अंगों का स्पर्श, चुंबन और घर्षण कर सुख प्राप्त करता है।

होली पर रेता मिले अबीर या गुलाल को वह नारी के गालों पर अत्यधिक रगड़ना चाहता है। नारी का यह अंग प्राय; अत्यधिक सुकोमल होता है। रेता की रगड़ से प्राय; त्वचा छील जाती है और नारी को इससे पीड़ा होती है। इस पीड़ा से कुछ पुरुषों को मजा जाता है, लेकिन जाने-अनजाने में यह भी यौन शोषण का ही एक रूप है।

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होली के बहाने सारी वर्जनाएं टूट जाएं और एक से अधिक नारी के अंगों के स्पर्श का अवसर मिल जाए और दिन तो यह समाज इसकी इजाजत नहीं देता। यही लोग तब कुपित होते हैं (होली के दिन) जब इनकी बहू, बेटी, बहन या पत्नी से दूसरे मनमाने तरीके से होली खेलना चाहते हैं। ऐसा तब भी होता है जब अपनी बहू, बेटी या पत्नी अपनी ‘सीमा’ में रहे और दूसरी होली पर बेशर्म हो जाएं, साथ ही हम पर कोई सामाजिक कायदा-कानून लागू न हो, इस मानसिकता से यह तय हो जाता है कि पुरुष सिर्फ अपने फायदे की सोचता है। उसे तो बस होली का बहाना चाहिए दरअसल वो इसी बहाने यौन शोषण करना चाहता है।

प्राय: देखने में आता है कि पुरुष जिस महिला से होली खेलना चाहता है, उसकी मानसिकता, दिक्कतों, स्वास्थ्य आदि का कोई ख्याल नहीं रखता बीमार है तो उसे बिस्तर से खींच लेना, गर्भवती भी हो तो उससे लिपटना, घूमना, नाचने का प्रयास करना, हाथ न आए तो पीछे दौड़ना अर्थात उसके साथ यथासंभव मनमानी करना होली पर पुरुषों की सामान्य फितरत है। होली पर रंग लगाने के बहाने गालों या किसी अन्य अंग पर नोंच लेना, स्तनों को यथासंभव कसकर दबा देना जैसी घटनाएं आमतौर पर होती है। यह सब यौन हिंसा का ही प्रकार हैं।

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ऐसे में कुछ औरतें लोकलाज के भय से प्राय: चुप रह जाती हैं मगर कुछ जो चुप नहीं रह पाती और शोर मचा देती हैं। तब होली के रंग में भंग पड़ जाता है। होली का जश्न, झगडे, मारपीट, गाली-गलोच, थाने-अदालत के लफड़े में बदल जाता है। संबंधों में तल्खी हमेशा  पड़ जाती है। होली बुद्धिमानी  का त्यौहार है, मूर्खताओं का नहीं, यद्यपि इसे मूर्खों के पर्व के रूप में निरूपित किया गया है। मूर्खता की एक सीमा होनी चाहिए। नई फसल आने वाली है, फुर्सत भी है। ऐसे में जश्न मनाना अच्छा है। हल्की-फुल्की पुरानी रंजिशों को भूलकर पुनः सम्बन्ध बनाना अच्छा है। जिनके जीवन में रोज-रोज अच्छा खाने को उपलब्ध नहीं, वे होली के बहाने कुछ अच्छा बना खा लेते है। जीवन में विविध रंग न हों तो जीवन रुखा-रुखा सा रहे परन्तु होली मनाने की कुछ सीमाएं होनी चाहिए।

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होली मनाने वालों की कुछ जिम्मेदारियां भी होनी चाहिए। अगर हम किसी बीमार से होली खेलने की जबरदस्ती करते हों तो हमें यह भी ध्यान में रखना होगा कि उसका स्वास्थ्य ख़राब न हो, कहीं धन के अभाव में वह उचित चिकित्सा से तो वंचित नहीं तो हम उसकी क्या आर्थिक मदद कर सकते हैं। हम दारू-मांस गले तक खाएं, उल्टियां करें बेहतर हो कि उन लोगों की मदद करें जो होली पर पकवानों की कमी का शिकार हैं उसकी मदद करें।

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कोई रंग नहीं लगवाना चाहता तो उसे परेशान करने के बजाय उसकी मानसिकता को प्यार व सहयोग देकर बदलने की कोशिश करें। याद रखें कुछ लोगों को दूसरे को कष्ट देकर खुशी मिलती है तो कुछ ऐसे होते हैं जो दूसरों पर उपकार करके सुख प्राप्त करते हैं। इतिहास और वर्तमान दोनों को किस श्रेणी में रखता है? आप सोचिए आप कैसे बनना चाहेंगे? यूँ तो बाकी दिनों में पुरुष यौन हिंसा के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करने के समर्थक होते हैं लेकिन होली के बहाने ज्यादातर पुरुष महिलाओं का यौन शोषण करते हैं। उन्हें अपनी मानसिकता बदलने की आवश्यकता हैं।

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