कोई काम छोटा नहीं, सोच है छोटी

कोई काम छोटा नहीं, सोच है छोटी
March 16 23:13 2019 Print This Article

Unemployment – पकोडा, बैंडबाजा, ढोर चराना, सहित कामों को लेकर उडाया जा रहा है मजाक
भोपाल। शेक्सपीयर ने जब यह कहा कि नाम में क्या रखा है, तो ठीक इस लाइन के नीचे अपना नाम भी लिखा। वरना पता ही नहीं चलता कि इस लाइन को किसने लिखा है। इससे एक बात तो पता चलती है कि नाम और पद में बडा रहस्य छिपा हुआ है। जब हम किसी को हमारे द्वारा किए जा रहे काम को बताते है, तब दूसरा हमारा काम जानकर हमारी हैसियत का अंदाजा लगा रहा होता है।

CM Kamalnath in Davos  

इस लिहाज से जब हम पकौडा तलना, बैंड-बाजा बजाना, ढोर चराना सहित कामों को करते है, तो हमारे बारे में एक राय बना ली जाती है। प्रधानमंत्री नरेंन्द्र मोदी ने जब पकौडा तलने को रोजगार बताया था, तब कांग्रेस सहित विपक्ष के दलों ने इसका मजाक उडाया था। अब मप्र की कमलनाथ सरकार ने ढोर चराने और बैंडबाजा बजाने के लिए ट्रेनिंग शुरू कराने की बात कहीं तो इसका भी सोशल मीडिया पर मजाक बनाया गया।

लेकिन कभी हमने यह सोचा है कि पकौडा तलने, बैंड बजाने सहित छोटे कामों में हम सबसे अच्छे हो जाए तो हमारी हैसियत मल्टीनेशनल कंपनी में गधे की तरह काम करने वाले युवक से बेहतर हो सकती है। बडे उदाहारण है कि आईआईटी, आईआईएम और मैनेजमेंट इंस्टीटयूट से डिग्री पास करके निकले युवक युवती अब होटलिंग, टैवलिंग, गार्डनिंग, डेयरी सहित कामों को स्टार्टअप के नाम पर कर रहे है। एक कंपनी की तर्ज पर जब यह काम हम करते है, तो समाज हमें हिकारत की नजर से नहीं देखता है।

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कमलनाथ सरकार से मप्र के युवाओं को बहुत उम्मीदें है। शिवराज सरकार ने प्रदेश में 13 साल तक शासन किया। लेकिन रोजगार के क्षेत्र में कुछ खास नहीं कर पाए। इसकी वजह से प्रदेश में भाजपा की सरकार के तंबू उखड गए। देश में रोजगार का मुददा बडा है, लेकिन मीडिया की बहस से इसे हटा दिया है। क्योंकि रोजगार के मुददे पर बहस कराएंगे तो मीडिया हाउस के मालिकों के दूसरे धंधे खतरे में पड जाएंगे। इसलिए रोजगार के मुददे को नहीं उठाया जाता है।

कमलनाथ से उम्मीदें इसलिए है कि वह स्वयं एक उद्योगपति है। सीधे तौर पर उनकी कोई कंपनी नहीं है, लेकिन व्यवसाय लंबा चौडा है। कहा तो यह भी जाता है कि देश के उद्योगजगत में प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी से ज्यादा बडी हैसियत कमलनाथ की है। इसकी वजह उनकी कार्पोरेट स्टाइल भी मानी जाती है। जब कमलनाथ उद्योगपतियों से बात करते है, तो लगता है कि प्रदेश में उद्योग की बहार आ सकती है। अगर उन्होंने उद्योगों को लगवाकर लाखों बेरोजगारों को रोजगार दे दिया तो मप्र में कांग्रेस 10 साल के लिए फिक्स शासन कर सकती है।

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छिंदवाडा में जिस तरह से उद्योग लगाकर विकास किया है, वह मॉडल गुजरात मॉडल के स्तर का है। लेकिन गुजरात और मप्र में जमीन आसमान का अंतर है। गुजरात का व्यक्ति जन्मजात उद्योगपति है, जबकि मप्र का व्यक्ति एक सरकारी नौकरी को पाकर सबकुछ पाने की सोच रखता है। इसलिए गुजरात को विकसित राज्य बनाना आसान है, जबकि मप्र में उद्योगों का जाल बिछाना इतना आसान नहीं है। विधानसभा में पूर्व की भाजपा सरकार ने बताया था कि इन्वेस्टर्स समिट में लगभग सौ करोड से अधिक का खर्च हो चुका है, लेकिन नया उद्योग कौन सा लगा है। इसकी जानकारी नहीं दे पाए। मप्र में जितने भी उद्योग लगे है, वह सब कांग्रेस सरकार की देन मानी जाती है।

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