बीएसएनएल में कुछ नहीं बचेगा, सब कुछ बेच दिया जाएगा?

बीएसएनएल में कुछ नहीं बचेगा, सब कुछ बेच दिया जाएगा?
February 20 18:58 2019 Print This Article

BSNL- वासुदेव शर्मा
लालबहादुर शास्त्री जैसी नैतिकता होती तो दे देते त्यागपत्र
भोपाल। निजीकरण और कॉर्पोरेट स्टाइल में काम कराने की चाह सबसे अधिक बीजेपी को है। विनिवे के नाम पर देश में अच्छे खासे चलते उपक्रम बेचे जा रहे है। हालात यह है कि नौकरी तो सरकार पैदा नहीं कर पा रही है, लेकिन नौकरी से छिनने की कोशिशे लगातार चल रही है। देश में नौकरी पर हथौडा चलाने वाला निर्णय नोटबंदी था। जिसे अलग-अलग तर्क-कुतर्क देकर बचाया जा रहा है। अगर लालबहादुर शास्त्री जैसी नैतिकता वर्तमान के
नेताओं में होती तो नोटबंदी जैसे निर्णय के बाद बदले हालात में त्यागपत्र दे देते। लेकिन अब नेताओं में वह नैतिकता बची ही नहीं है।

हम बात कर रहे है, देश की सबसे बडी सरकारी टेलीकॉम कंपनी बीएसएनएल की। जिसे बंद की खबर चल
रही है। बीएसएनएल में 65000 हजार कर्मचारियों की छंटनी तथा बंद करने की खबर पर मुख्यधारा के
मीडिया की खामोशी भयावह है। चैनल तो जैसे सरकार के ब्राडिंग एजेंट हो गए है। हर गलत निर्णय का बचाव ऐसे करते है कि जैसे वह निर्णय उन्होंने खुद ही लिया हो।

BSNL Vasudev sharma

सबसे विनाषकारी फैसला

मोदी सरकार के 5 साल में लिए गए फैसलों में सबसे अधिक विनाशकारी एवं हानिकारक फैसला बीएसएनएल में छंटनी या उसे बंद करने वाला होगा। राफेल सौदा एक घोटाला है। भारत में घोटाले होते रहते हैं, इसका जनता पर सीधे कोई असर नहीं पड़ता, लेकिन बीएसएनएल के बंद होने का असर सीधे लोगों पर पडने वाला है। बीएसएनएल का बंद होना या छंटनी होने का असर सिर्फ वहां काम कर रहे कर्मचारियों पर ही नहीं पडने वाला, इसका असर समूची जनता पर पड़ेगा।

खुलेंगे मनमानी के रास्ते

बीएसएनएल के बंद होने से निजी टेलीकाम कंपनियों की मनमानी के रास्ते खुल जाएंगे, फिर वे इस क्षेत्र में जो करना चाहेंगे, करते रहेंगे क्योंकि प्रतिस्पर्धा में जनता का अपना कोई उपक्रम नहीं होगा, जिसके सहारे डिजीटल इंडिया से जुड़ा रहा जा सके। उदारीकरण के बाद सरकारें जिस रास्ते पर चली हैं और चल रही हैं, उससे ऐसा लगा रहा है कि अब देश में सरकार का अपना कुछ नहीं बचने वाला। बीएसएनएल को पहले ही खस्ता हालत में पहुंचा दिया गया था, वह नाम के लिए चल रहा था, अब वह भी नहीं रहेगा। बीएसएनएल के बाद सरकार के पास जो खस्ताहाल स्थिति में उसके उपक्रम बचे हैं, वे भी देर-ंसबेर बेचे ही जाएंगे।

थोपे जाएंगे जनता पर कर

इस तरह सबकुछ बेच-ंबाच कर सरकारें टैक्सों पर निर्भर होकर जनता पर तरह-ंतरह के टैक्स थोपेंगी। चूंकि
सत्ता के खर्चे कम होंगे नहीं और हुकूमत करने के लिए पैसा चाहिए, जिसे टैक्स से ही वसूला जाएगा। इसलिए कह सकते हैं कि सरकारी उपक्रम बीएसएनएल को बंद करने का असर जनता पर भी पड़ेगा, उनके बच्चों को
मिलने वाली अच्छी नौकरियों के रास्ते हमेशा के लिए बंद हो जाएंगे। चूंकि बीएसएनएल को बंद करने का फैसला लेने के पीछे का कारण उसके घाटे में उसके घाटे में चलना बताया गया है, फायदे में चलने वाली बीएसएनएल को घाटे में सरकार ने ही पहुंचाया है क्यों पहुंचाया होगा, यह बात अब स्पष्ट हो जानी चाहिए।

जो मुनाफे में नहीं होंगे बंद

यहां सवाल यह है कि जो घाटे में है या जिससे सरकार को मुनाफा नहीं हो रहा, क्या उसे बंद कर दिया जाएगा…? यदि सरकार इसी रास्ते पर चली, तब क्या सरकारी स्कूल, कालेज, यूनिवर्सिटी, अस्पताल, बैंक, बीमा, कोयला आदि आदि कुछ भी बचा रह पाएगा और जब यह नहीं बचेंगे, तब आप क्या करेंगे जरा सोचिए, इसीलिए सरकारी उपक्रमों को बचाने के चल रहे संघर्षों को मिलजुलकर आगे बढाने का यही वक्त है, यह वक्त मोदी को विदा करने का भी। कुछ को अटलजी बेच गए थे, बचा खुचा मोदी बेचे जा रहे हैं, ऐसा लगा रहा है जैसे इनके पुरखों की जायदाद है भारत।

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